रविवार, 8 अक्तूबर 2017

एक पुत्र को जन्म दिया था सीता ने!

रामायण की कथा के कई सारे संस्करण उपलब्ध हैं, लेकिन उस काल का सही वर्णन महर्षि वाल्मीकि द्वारा रची गई वाल्मीकि रामायण में ही मिलता है। वाल्मीकि रामायण के बाद श्रीराम एवं सीता के जीवन के सफर को अन्य कई ऋषि-विद्वानों ने अपने अनुसार लिखने की सोची।
फलस्वरूप कई सारे ग्रंथों-उपग्रंथों का जन्म हुआ। इनमें असल वाल्मीकि रामायण मंर बताए गए कई तथ्य तो मौजूद होते हैं, लेकिन कुछ रामायण प्रसंगों को कहानी का रूप देते हुए बदल दिया जाता है।
इन सभी ग्रंथों में राम एवं सीता के मिलन से लेकर वनवास एवं रावण के अंत की कथा अवश्य होती है, लेकिन इसके बीच कई सारी ऐसी कहानियां जोड़ दी गई हैं जिनका प्रमाण कहीं नहीं मिलता। उदाहरण के लिए जैन रामायण के अनुसार रावण को श्रीराम ने नहीं, बल्कि लक्ष्मण ने मारा था।
आनंद रामायण के अनुसार श्रीराम एक कठोर राजा थे, वे अपने राज्य में किसी को हंसने की अनुमति नहीं देते थे। किंतु ये सभी बातें वाल्मीकि रामायण में नहीं मिलती। महर्षि वाल्मीकि ने तो कभी “लक्ष्मण रेखा” का भी वर्णन रामायण कथा लिखते हुए नहीं किया।
रामायण काल के जिस प्रसंग की आज हम यहां चर्चा करने जा रहे हैं, वह श्रीराम एवं सीता जी और लक्ष्मण के वनवास से वापस अयोध्या आने के बाद की घटना पर है। यह वह समय है जब श्रीराम एवं सीता जी को पहली बार पता चलता है कि वे माता-पिता बनने वाले हैं।
यह सूचना मिलने पर कि सीता जी गर्भवती हैं, पूरे महल में खुशियों का माहौल बन गया, श्रीराम के साथ-साथ परिवार के सभी सदस्य अत्यंत प्रसन्न थे। लेकिन इन खुशियों के जाने का और दुखों के आने का समय दूर नहीं था।
जल्द ही यह बात सबके समक्ष आने लगी कि सीता जी अपने पति से दूर लंका में रहकर आई हैं, लेकिन सब जानते हुए भी श्रीराम ने उन्हें अपने जीवन में पनाह दी है। यह ऐसा समय था जब पत्नी यदि एक रात भी अपने पति से दूर रहती थी, तो उसे दोबारा पति के घर में दाखिल होने की अनुमति नहीं मिलती थी।
लेकिन लंबे समय के लिए रावण की लंका में रहने के बावजूद भी सीता जी अयोध्या के महल में सुखी थीं। यह देख अयोध्या की सभी पत्नियां भी अपने पति का विरोध करने लगीं। अब बात श्रीराम तक आ पहुंची, इस स्थिति को देखते हुए सीता जी ने स्वयं ही अयोध्या छोड़कर चले जाने का फैसला कर लिया।
स्वयं लक्ष्मण उन्हें जंगल तक छोड़कर आए जहां महर्षि वाल्मीकि उन्हें आकर ले गए। इस समय सीता जी गर्भवती थीं, यह ऐसा समय था जब उन्हें श्रीराम की सबसे अधिक आवश्यकता थी, लेकिन प्रजा का सुख देखते हुए उन्होंने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में एक आम संन्यासिन बनने का निर्णय ले लिया।
आश्रम में पहुंचकर महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें अयोध्या की सभी बातें भुलाकर, एक सामान्य जीवन व्यतीत करने की सलाह दी, तभी वे अपने दर्द से बाहर आ सकेंगी।
कई दिन बीत गए, दिन कुछ महीनों में भी तब्दील हो गए। वह समय बेहद समीप आ गया जब सीता जी एक संतान को जन्म देने वाली थीं। इस बीच ना उन्होंने अयोध्या के साथ किसी प्रकार का कोई संपर्क साधने का प्रयास किया और ना ही वहां से वाल्मीकि आश्रम में कोई सुखद संदेश आया।
कहा जाता है कि सीता जी के अयोध्या छोड़ देने के बाद श्रीराम ने राज्य तो बखूबी संभाला, लेकिन वे अंदर से दुखी रहने लगे। यह भी कहा जाता है कि श्रीराम जमीन पर सोते थे।
कुछ और दिन बीते तो वाल्मीकि आश्रम में नन्हें से बच्चे की किलकारी गूंज उठी। सीता जी ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया। वाल्मीकि जी के साथ आश्रम के सभी लोग प्रसन्नता से भर गए।
सीता जी द्वारा संतान को जन्म देने की घटना से संबंधित कई कहानियां प्रचलित हैं। लोक कथाओं के अनुसार तो सीता जी ने एक साथ दो बालकों को जन्म दिया था। लेकिन महर्षि वाल्मीकि द्वारा रची रामायण में इसका उल्लेख नहीं मिलता। ना ही इस बात को कोई प्रमाण दिया जाता है।
बल्कि एक अन्य कथा के अनुसार कुश के जन्म की बात बताई जाती है। जिस पुत्र को सीता जी ने जन्म दिया, उसका नाम ‘लव’ रखा गया। लव के जन्म के बाद सीता जी का अधिकतम समय उसके पालन-पोषण में गुजरता। आश्रम के अन्य लोग भी उसका ध्यान रखने में सीता जी की मदद करते।
एक दिन सीता जी कुछ आवश्यक लकड़ियां लाने के लिए आश्रम से बाहर के पास स्थित जंगल जा रही थीं (अन्य कथा के अनुसार नहाने के लिए नदी तक जा रही थीं), लेकिन उन्हें यह चिंता थी कि वे लव को कैसे लेकर जाएं।
निकलते हुए उन्होंने वाल्मीकि जी को कुछ कार्य करते हुए देखा, तो उन्होंने उनसे लव पर नजर रखने को कहा। सिर हिलाते हुए जवाब में हां कहकर वाल्मीकि जी ने लव को उनके पास बैठाने के लिए कह दिया, लेकिन जैसे ही सीता जी कुछ आगे बढ़ीं तो उन्होंने देखा कि महर्षि का ध्यान केवल अपने कार्य में हैं और वे लव की ओर देख भी नहीं रहे।
इसलिए सीता जी ने लव को साथ ही लेकर जाने का निर्णय लिया, लेकिन जब उन्होंने लव को उठाया तो महर्षि ने यह दृश्य नहीं देखा। कुछ देर बाद जब महर्षि ने इधर-उधर देखा तो उन्हें लव दिखाई नहीं दिया और उन्हें यह भय हुआ कि हो ना हो लव कहीं चला गया होगा और किसी जानवर का शिकार हो गया होगा।
अब वे सीता जी को वापस आश्रम लौटने पर क्या जवाब देंगे, सीता विलाप करने लगेगी, इसी डर के कारण वाल्मीकि जी ने पास में पड़े कुशा (घास) को लिया और कुछ मंत्र पढ़ने के बाद एक ‘नया लव’ बना दिया। यह लव हूबहू पहले जैसे लव की तरह ही था, अब उन्होंने सोचा कि सीता के वापस लौटने पर वो उसे यही लव सौंप देंगे और कुछ नहीं बताएंगे।
कुछ समय के पश्चात जब सीता आश्रम लौटीं ने उन्हें देख महर्षि चकित रह गए। उनके पास लव को पहले से ही देख वे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे। पूछने पर मालूम हुआ कि सीता जी लव को अपने साथ ही ले गई थीं।
लेकिन जब सीता जी ने उस नए लव को देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुईं। कुशा के कारण जन्म होने की वजह से, उसका नाम ‘कुश’ रखा गया। और वह श्रीराम और सीता जी की दूसरी संतान के रूप में जाना गया।

शनिवार, 11 मार्च 2017

किसी का भी झूठ पकड़ सकते हैं आप, जानें कैसे


लोगों की आदतें उनके स्वभाव का एक बड़ा हिस्सा बन जाती हैं। तभी तो वे क्या बोलते हैं, समझते हैं और क्या करना चाहते हैं इसका अंदाजा लगा पाना कठिन हो जाता है। उनका अंदाज़ इतना प्रभावशाली बन जाता है कि उनके द्वारा बोला गया झूठ भी सच लगने लगता है।

लोगों का अंदाज़

जी हां, कुछ लोगों का व्यक्तित्व ही कुछ इस प्रकार का होता है कि वह झूठ को भी सच से बढ़कर प्रदर्शित कर सकते की क्षमता रखते हैं। इतनी सफाई से झूठ बोलते हैं कि उसके सामने आपको सच्ची बात भी झूठी लगने लगती है।

झूठ से बचें

लेकिन सच को नीचा दिखाते हुए बोला गया झूठ आपके लिए बेहद हानिकारक है। इससे जितना हो सके बचें, परन्तु मुद्दा तो यह है कि हम कैसे पहचानें कि सामने वाला व्यक्ति सच बोल रहा है या झूठ’?

झूठ का आत्मविश्वास

क्योंकि उसका बोलने का अंदाज़, उसका आत्मविश्वास और उसकी ओर से दी गईं दलीलें हमें इस असमंजस में डाल देती हैं कि किस बात पर विश्वास करें और किस पर नहीं।

कुछ आसान टिप्स

आपकी इसी दुविधा को हल करने के लिए इस आलेख  में कुछ ऐसे तरीके बताए जा रहे हैं जो आपको झूठ पकड़ने में मदद कर सकते हैं। यह टिप्स इतने कारगर हैं कि ये एक विशाल समुद्र में से भी पत्थर का छोटा सा टुकड़ा खोज पाने जितनी क्षमता से लैस हैं।

सच एवं झूठ में फर्क

दरअसल यह कोई जादू-टोना नहीं है बल्कि ऐसे टिप्स हैं जिन्हें आज़माने पर आप सच एवं झूठ में फर्क खोज सकते हैं। लेकिन इसके लिए जरूरी है आपकी एकाग्रता। आप जितना ध्यानबद्ध होकर सामने वाले व्यक्ति की समीक्षा करेंगे, उतना ही आप समझ पाएंगे कि उसके दिमाग में चल क्या रहा है।

दिलोदिमाग में चल रही बात

दूसरे शब्दों में यह मन एवं मस्तिष्क में चल रही बात को खींचकर ज़ुबान पर लाने की एक कोशिश है, जिसके सफल होने की संभावना काफी ज्यादा होती है। इन आसान टिप्स में आपको जिस व्यक्ति के सच या झूठ का टेस्ट करना है, उसकी हर हरकत का ध्यान रखना होगा।

पढ़ें बॉडी लैंग्वेज

सबसे पहले ध्यान दें उसकी बॉडी लैंग्वेज पर। किसी से बात करते समय जब भी आपको शक हो कि सामने वाला इंसान हो ना हो आपसे झूठ बोल रहा है तो उसकी बॉडी लैंग्वेज यानी कि उस समय वह किस तरह से व्यवहार कर रहा है, उस पर ध्यान दें।

चेहरे की चिंता

यदि बोलते समय वह बेहद आराम से बैठा है, उसके चेहरे पर कोई चिंता नहीं है तो इसका मतलब है वह झूठ नहीं बोल रहा। लेकिन इसके विपरीत यदि बात करते समय अचानक वह अपने हाथ-पांव हिलाने लगे, हाथों को जेब के भीतर डाल ले या फिर पांव को बैठे-बैठे हिलाने लगे तो इसका मतलब है कि कुछ गड़बड़ है।

हाथ-पांव की हलचल

उसकी ऐसी हरकत उसके भीतर चल रही चिंता को दर्शाती है। झूठ बोलते हुए भी उसके पकड़े जाने का भय उससे ऐसे फिजूल काम करवाता है। अमूमन ऐसी अवस्था में लोग झूठ बोलते समय हाथ-पांव खुजाते हैं या फिर सिर खुजाते हैं। तभी समझ जाएं कि वह इंसान आपसे कुछ छिपा रहा है।

आंखों की मूवमेंट

बॉडी लैंग्वेज में खास है आंखों द्वारा की जा रही हरकत। आंखें हमारे मन की खिड़की का काम करती हैं। जो मन में है वही आंखें उसी रूप में व्यक्त कर देती हैं। यदि बात करते समय कोई पूरे आत्मविश्वास से आंखों में आंखें मिलाकर बात कर रहा है तो उसके दिल में कोई दोष नहीं है।

आंखें चुराकर बात करना

लेकिन यदि वह आंखें चुरा रहा है या फिर बात करते समय उसकी आंखें आपकी बजाय कहीं दूसरी दिशा में हैं तब भी यह उसके द्वारा बोले जा रहे झूठ की निशानी है। कई बार बातों को छिपाने के लिए भी लोग बोलते हुए ज़मीन की ओर देखते हैं।

आवाज़ की थरथराहट को पहचानें

केवल आंखों की घबराहट ही नहीं, आवाज़ की थरथराहट भी बोले गए झूठ को बखूबी व्यक्त कर देती है। अचानक आवाज़ की टोन का बदल जाना, या फिर जानबूझकर कुछ छुपाते हुए जल्दी में बात करना। इतना ही नहीं, आवाज़ की हिचकिचाहट भी झूठ का पर्दाफाश कर देती है।

हिचकिचाहट

ऐसे में आपको इस आवाज़ को पहचानने की जरूरत है। फर्ज़ कीजिए, आप किसी से बात कर रहे हैं और अचानक अपने मन का कोई शक दूर करने के लिए आपने उनसे कोई सवाल कर लिया, तभी आगे से आपको चुप्पी मिलती है।

बातों को घुमाना

कुछ पल की शांति और फिर दोबारा उकसाने पर वह इंसान बातों को घुमाते हुए जब सामान्य गति से तेज़ अंदाज़ में बात करता है तो तुरंत भांप लें कि वह इंसान आपको झूठी पट्टी पढ़ा रहा है।  
तभी कहा जाता है कि किसी व्यक्ति के बोलने के अंदाज़ को समझ पाना ही अपने आप में एक कला के समान है। और यदि आप इसमें सफल हुए तो आपको कोई इंसान भी झूठी बात कहने की हिम्मत नहीं करेगा।  
परन्तु कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यह जरूरी नहीं कि तेजी से बोलने का संबंध झूठ से ही है। कई बार हड़बड़ाहट में भी इंसान गति बढ़ा लेता है। ऐसे में अपनी दुविधा को दूर करने के लिए आप एक और तरीका अपना सकते हैं।  
यदि नॉर्मल तरीके से बात करते हुए आपका दोस्त बहुत धीरे और सोच-सोचकर बात करने लगे तो तब भी यहां शक की संभावना बन जाती है।

यहां बढ़ती है शंका


दरअसल बात केवल गति की नहीं है, बात यह है कि आपसे वार्तालाप करते समय यदि अचानक कुछ पूछे जाने पर सामने वाले व्यक्ति की बोलने की स्पीड में बदलाव आए तो इसका कारण झूठ हो सकता है।